राष्ट्रीय बालिका दिवस और आज की समाज
24 जनवरी
को देश भर मैं ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’’ (नेशनाल गर्ल चाइल्ड डे) मनाया जाता है । ईस का सुरूवात सन 2009 से हुआ था। मकसद यही था कि, हर लड़की को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना और समाज मैं लड़का –लड़की की जो
असमनता तथा भेद-भाव का ‘लक्ष्मणरेखा की दीवार’ को हटाना है। जब संविधान को देश
मै क्रियान्वित किया गया था , तब भी ‘गर्ल
चाइल्ड’ और ‘वुमेन एमपोवेर्नमेंट’ जेसे मुद्दा चर्चा की मुख्य विंदु था और आज भी ये है। माने, आजादी के 60 साल के बाद भी हम ईस
दोनों विषय का, समाधान की रास्ता निकालने के लिए कोशिश ही कर रहे हैं। आज हम ‘टेकनीक युक्त देश’ के रूप मै आपनी पहचान बना रहे है
और समाज मै शिक्षा के प्राति लड़कियों की भागीदारी तो बढ़ रही हैं, परंतु आगे जा कर वे शिक्षा के माध्यम से कितना शशक्त कर पाए हैं, व सभी पहलू की ऊपर गौर करने की जरूरत है । प्रधानमंत्री श्री नरेद्र मोदी
जी ने वर्ष 2015 मै, हरियाणा की पानीपत से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की
अभियान सुरू किए थे; जो एक सफल और सकारात्मक पहल था। ईस
अभियान से देश की प्रधानमंत्री की तरफ से समाज के आखिर छोर मैं बेठा हुआ, समाज की आखिर व्यक्ति के लिए सीधा संदेश था । परान्तु, लड़कियों की शिक्षा प्रति समाज की किया नज़रिया है, व भी हमें देखने की जरूरत हैं । सन 16 दिसम्बर, 2012
मै दिल्ली की ‘निर्भया’ दर्दनाक घटना
होने के बाद, पूरे देश मैं एक आक्रोशित माहोल था । और देश भर
मैं लड़कियों की प्रति होने वाले अत्याचार घटनाओं की विरोध मैं एक बड़ा मूहीम भी
चलाया गया । परंतु,
आज भी समाज मैं लोगों की सोच मैं कुछ भी ज्यादा वदलाब नहीं हुआ हैं। उदाहरण
के लिए, हाल ही की दो घटनाओ से तो यही ही प्रतीत हो रहा है।
पहला तो, हरियाणा की जींद मै हुई एक कम उम्र की लड़की के साथ
दुष्कर्म की दर्दनाक घटना और दूसरा दिल्ली की
एक पाश ईलाके मै रहने वाली डॉक्टर महिला के द्वारा, अपनी
घर पर काम करनेवाली झारखंड की 14 साल की
बच्ची के साथ हुई अमानवीय सलूक की घटना था । ये दोनों घटना से कहीं ना कहीं समाज
की नज़रिया और सोच पता चलता हैं कि, यदि कानून शक्त बनाने से
ही समस्या की समाधान हो जाता तो, दोनों घटनाये नहीं होता !
निर्भया घटना के बाद, बड़ी मात्रा मैं जागरुकरता से पूरे देश मैं लड़कियों कि प्रति अमानवीय
घटनाएँ कम नहीं हुआ हैं। यूँ तो आंकड़े ‘शिक्षा’ मैं लड़कियों कि भागीदारी को दर्शाता हैं।
परंतु, सच यह भी हैं कि, ये आंकड़े की खेल मैं ‘शिक्षा’ की महत्व कहीं ना कहीं गुम होती जा रही हैं। ईस का वजह, हमारे समाज मैं चल रही रूढ़ी-वादी परंपरा सब से एक प्रमुख कारण भी है। जेसे
कि, जब भी हमारे समाज
मैं किसी घर पर कभी लड़की कि जन्म लेती हैं, तब घर पर सनाता पसर जाता हैं। मानों, घर पर कोई
पाहाड़ टूट गया हो। जब कि, कोई लड़का कि जन्म लेता हैं, तब घर मैं एसे खुसियाँ मनाया जाता हो, जेसे कि कोई
बड़े तोहार की मौसम हो। यह मनुस्थिति पूरे देश की हैं। हालांकि, आदिवासी परिवारों मैं यह स्थिति संपूर्ण रूप से अलग है। कियू कि, आदिवासी परिवारों मैं हमेशा ही लड़की- लड़का के मध्य सम्मान दर्जा दी गई
हैं और आदिवासी समाज मैं लड़की को बाकी समाज से कहीं ज्यादा अधिकार दी गई हैं। सरकारें विभिन्न नीति तो बना कर, धरातल मैं क्रियान्वित तो कर रहे हैं, व सभी तब सफल
होगा, जब हम सभी का नजरियाँ बड़ल पाएगा। कियू कि, आज कल अपनी लड़कियों को ग्राड़ुएट तक ईसलिए पढ़ाना चहाता हैं, ताकि
सादी- व्याह के लिए सही लड़का मिल सके। यह कारण हैं कि, ‘हायर एदुकेशन’ मैं लड़कियों की भागीदारी अक्सर कम देखने को मिलता हैं। आज कई
राज्यों, जेसे कि पंजाब, बिहार आदि
मैं सरकारी स्कूल और कॉलेज मैं पी.एच.ड़ी. तक पूरे फीस माफ हैं, जब कि ओडिशा, मध्यप्रदेश,
हरियाणा आदि राज्यों मै,
‘शिक्षा’ को बढ़ावा देने हेतु कई
सारे कदम उठाये गए है। फिर भी, घर-परिवार मैं बेटियों कि ‘शिक्षा’ को लेकर कोई सकारात्मक रुचि आज भी देखने को
नहीं मिलता हैं। यही वजह था कि, कभी भारत कि प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नहरु जी ने बोले थे कि, ‘किसी भी घर पर जब कोई लड़का कि जन्म लेता हैं, व सिर्फ एक परिवार कि भला सोच सकता हैं; जब कि एक
लड़की जब किसी परिवार मैं जन्म लेती हैं, व संपूर्ण पीढ़ी के
लिए भला सोचती हैं। माने- समाज की प्रगति के लिए
बेटियों की सर्वांगीन विकास जरूरी हैं और ये भी जरूरी हैं कि, समाज मैं लड़कियों की लिए, परिवार कि नजरियाँ बदले ।
ईस के लिए, सिर्फ ‘शिक्षा’ मैं प्रतिशत बढ़ने से बदलाव नहीं
होगा, व सिर्फ खुद की सोच मैं बदलाव से होगा। कियू कि, यदि हमें घर मैं बहू पढ़ी-लिखी चाहिए तो, आप की बेटी
भी तो किसी घर पर बहू हो कर जाएगी और छोटी बचे सिर्फ माँ से सब से ज्यादा सीखता
हैं और जब माँ पढ़ी-लिखी होगी तो, जाहिर सी बात हैं कि, आप की आने वाले पीढ़ी ‘शिक्षा’
की प्रगति कि और जाएगी। वह लड़का हो या फिर लड़की हो। यदि,
समाज मैं ईसी तरह 5 प्रतिशत भी रोज सोच ले, यकीन कीजिए समाज
मैं विकास की नई पारी सुरू होगी। जय हिन्द
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